पीलिया (JAUNDICE)

mata tara rani ki katha

पीलिया


          रक्त में लाल कणों की आयु 120 दिन होती है। किसी कारण से यदि इनकी आयु कम हो जाये तथा जल्दी ही अधिक मात्रा में नष्ट होने लग जायें तो पीलिया होने लगता है। रक्त में बाइलीरविन नाम का एक पीला पदार्थ होता है। यह बाइलीरविन लाल कणों के नष्ट होने पर निकलता है तो इससे शरीर में पीलापन आने लगता है। जिगर के पूरी तरह से कार्य न करने से भी पीलिया होता है। पत्ति जिगर में पैदा होता है। जिगर से आंतों तक पत्ति पहुंचाने वाली नलियों में पथरी, अर्बुद (गुल्म), किसी विषाणु या रासायनिक पदार्थों से जिगर के सैल्स में दोष होने से पत्ति आंतों में पहुंचकर रक्त में मिलने लगता है। जब खून में पत्ति आ जाता है, तो त्वचा पीली हो जाती है। त्वचा का पीलापन ही पीलिया कहलाता है।परिचय
:

          अधिकतर अभिष्यन्द पीलिया होता है। इसमें कुछ दिनों तक जी मिचलाता है, बड़ी निराशा प्रतीत होती है, आंखें और त्वचा पीली हो जाती है। जीभ पर मैल जमा रहता है तथा रोगी को 99 से 100 डिग्री तक बुखार रहता है। जिगर और पित्ताशय का स्थान स्पर्श करने पर कोमल प्रतीत होता है। पेशाब गहरे रंग का, मल बदबूदार, मात्रा में अधिक और पीला होता है।
4. सन्निपातज पाण्डु : इस तरह के पीलिया में तीनों दोषों के लक्षण दिखाई देते है। यह अत्यन्त असह्रा, घोर तथा कष्टसाध्य होता है। मिट्टी खाने के कारण उत्पन्न पीलिया में बल, वर्ण तथा अग्नि का नाश हो जाता है। नाभि, पांव तथा मूंह सूज जाते है। कृमि (पेट के कीड़े), कफ तथा रक्तयुक्त मल निकलता है। आंखों के गोलक, भौहों, तथा गाल पर भी सूजन आ जाती है।

कारण :

          अधिक स्त्री-प्रसंग (संभोग), खटाई, गर्म तथा चटपटे और पित्त को बढ़ाने वाले पदार्थ अधिक खाने, शराब अधिक पीने, दिन में अधिक सोने, खून की कमी तथा वायरस के संक्रमण के कारण, खट्टे पदार्थों का सेवन, राई आदि अत्यन्त तीक्ष्ण पदार्थों का सेवन आदि कारणों से वात, पत्ति और कफ ये तीनों दोष कुपित होकर पीलिया रोग को जन्म देते हैं।

लक्षण :

          बुखार, चक्कर आना, आंखों के सामने पीलापन दिखाई देना, कई बार आंखों के सामने अंधेरा छा जाना, आंखों में पीलापन, शरीर का पीला होना, पेशाब पीला आना, जीभ पर कांटे-से उग आना, भूख न लगना, पेट में दर्द, हाथ-पैरों में टूटन और कमजोरी, पेट में अफारा, शरीर से दुर्गंध का निकलना, मुंह कड़वा हो जाना, दिन-प्रति-दिन कमजोरी आना, शरीर में खून की कमी आ जाना आदि इस रोग के लक्षण है। रोग बढ़ने पर सारा शरीर हल्दी की तरह पीला दिखाई देता है। इसमें जिगर, पित्ताशय (वह स्थान जहां पत्ति एकत्रित होता हैं), तिल्ली और आमाशय आदि खराब हो जाते हैं।
          पीलिया रोग के अधिक बढ़ जाने पर सम्पूर्ण शरीर अथवा अंग विशेष में सूजन उत्पन्न हो जाती है। ऐसे रोगी को `असाध्य´ समझा जाता है। जिस रोगी के दांत, नाखून और आंखे पीली हो गई हो, हाथ, पांव तथा सिर में सूजन हो, सब वस्तुएं पीली दिखाई देती हो, गुदा, लिंग तथा अण्डकोषों पर सूजन हो तथा जिसका मल बंधा हुआ, अल्प, हरे रंग का तथा कफयुक्त हो, उसे असाध्य (जिसका इलाज नहीं हो सकता) समझा जाता है।
          पीलिया रोग में नाड़ी की गति कम (लगभग 45 प्रति मिनट), घी, तेल आदि चिकने पदार्थ नहीं पचते, जिगर में कड़ापन और दुखना, शरीर, आंखे, नाखून, मूत्र पीले दिखते हैं। शरीर में खुजली-सी चलने लगती हैं। शरीर में कहीं भी चोट लगने या किसी कारण से खून बहुत अधिक मात्रा में बहता है। आंखों का सूखना, रात को बहुत कम दिखता है। दिखने वाली वस्तुएं पीली दिखती है। वजन कम होना, पतले दस्त लगना, भूख कम लगना, पेट में गैस बनना, मुंह का स्वाद कड़वा, शरीर में कमजोरी-सी रहना, बुखार इसके प्रमुख लक्षण है। पहले रोगी को जुलाब दें, फिर औषधि सेवन करायें। सामान्यतया जुलाब से ही रोगी ठीक हो जाते है। इसके रोगी को पूर्ण विश्राम देना चाहिए।

भोजन तथा परहेज :

2. गिलोय :
37. ककड़ी : ककड़ी के रस में गाजर का रस मिलाकर पीने से संधिवात (गठिया) जैसे रोगों को दूर किया जा सकता है। खून में यूरिक एसिड की मात्रा अधिक हो जाती है तो संधिवात (गठिया) आदि की वेदना होती है। ककड़ी का रस एसिड को बाहर निकाल देता है। ककड़ी में पोटेशियम भी होता है, जो निम्न रक्तचाप के मरीजों के लिये भी गुणकारी होता है। ककड़ी से दांत और मसूढ़े भी मजबूत होते हैं। कई लड़कियां नाखूनों को बढ़ाकर सौंदर्य बढ़ाने की कामना करती है, परन्तु ना चाहते हुए भी उनके नाखून टूट जाते हैं, ऐसी औरतों को ककड़ी के रस का सेवन करना चाहिए। त्वचा के सफेद दाग आदि को दूर करने के लिये हरी घास का रस तथा 100 मिलीलीटर ककड़ी का रस मिलाकर हर रोज सुबह खाली पेट पीना चाहिए। बाल झड़ रहे हों तो इसके लिए गाजर एवं ककड़ी के रस को मिलाकर पीना चाहिए। ककड़ी के रस से बालों की लम्बाई बढ़ती है।